परम पूज्य भगवान जोरावर जी महाराज
सिद्ध श्री जोरावर धाम सेवा समिति
आस्था, शक्ति और परम शांति के प्रतीक — जिनका पावन सानिध्य जीवन के समस्त बंधनों और कष्टों का निवारण करता है।
मरुधरा की पावन भूमि पर ज्योतिर्मय प्राकट्य
राजस्थान की वीर प्रसूता और संतों की उर्वर धरा पर भगवान जोरावर जी महाराज का प्राकट्य जनसाधारण में सत्य, धर्म और दया के पुनर्जागरण हेतु हुआ। बाल्यकाल से ही विरक्त भाव धारण कर उन्होंने मरुस्थलीय एकांत में कठोर साधना की। प्रकृति की विषम परिस्थितियों में ग्रीष्म की प्रचंड धूप और शीत के तुषार में अविचल रहकर उन्होंने अखंड ब्रह्मचर्य और आत्मज्ञान की पराकाष्ठा को सिद्ध किया।
अखंड धूणा परंपरा
महाराज श्री द्वारा स्थापित अखंड धूणा आज भी अहर्निश प्रज्वलित है। इस पावन अग्नि की विभूति भक्तों के समस्त शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों का शमन करती है।
दीन-दुखियों पर कृपा
भगवान जोरावर के दरबार में कोई धनी अथवा निर्धन नहीं है। निष्कपट हृदय से जो भी याचना करता है, महाराज श्री की असीम अनुकम्पा से उसका मनोरथ अवश्य पूर्ण होता है।
धर्म एवं गो-संरक्षण
महाराज श्री ने गोवंश सेवा, अन्नदान और सत्य आचरण को जीवन का सर्वोत्तम कर्तव्य बताया। यही कारण है कि धाम में नित्य अन्नक्षेत्र एवं कामधेनु गौशाला संचालित है।
महाराज श्री के अमर उपदेश
सत्य ही ईश्वर का साक्षात्कार है। वाणी में मधुरता और हृदय में छल-कपट का त्याग ही सच्ची पूजा है।
संसार के प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का वास है। भूखे को भोजन, निर्बल को संबल और असमर्थ को आश्रय देना सबसे बड़ा पुण्य है।
जीवन के सुख और दुःख दोनों ईश्वर के विधान हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य और धर्म का मार्ग न त्यागें।
दैनिक कर्म करते हुए भी मन में प्रभु का स्मरण बनाए रखें। कर्म ही पूजा है जब वह निष्काम भाव से किया जाए।
